भास्कर एक्सप्लेनर: विराट की आपत्ति के बाद SG बॉल में हुए 3 बदलाव, दावा- जल्दी खराब भी नहीं होगी; टीम इंडिया ने अब बॉल को बताया विचित्र

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4 घंटे पहलेलेखक: जयदेव सिंह

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भारत और इंग्लैंड के बीच शुरू हुई टेस्ट सीरीज के पहले मैच में भारत को हार का सामना करना पड़ा। मैच में सन्सपरेल्स ग्रीनलैंड यानी SG की मॉडिफाइड बॉल इस्तेमाल हुई। कहा गया, इससे स्पिनर्स के साथ ही तेज गेंदबाजों को भी मदद मिलेगी।

SG बॉल को लेकर टीम इंडिया ने पहले भी शिकायत की थी। इसके बाद SG ने बॉल पर नए सिरे से काम किया। 18 महीने बाद इंग्लैंड के खिलाफ हुए पहले टेस्ट में ये नई गेंद पहली बार इस्तेमाल हुई, लेकिन टीम इंडिया अभी भी बॉल की क्वॉलिटी से खुश नहीं है।

विराट और अश्विन ने कहा था- बहुत जल्दी घिस जाती है SG बॉल

SG बॉल की क्वालिटी को लेकर विराट कोहली और रविचंद्रन अश्विन जैसे खिलाड़ी सवाल उठा चुके हैं। बदलाव के बाद भी दोनों नाखुश हैं।

  • 2018: विराट ने वेस्टइंडीज सीरीज के दौरान कहा था कि पांच ओवर में बॉल का घिस जाना ठीक नहीं है। SG बॉल पहले इस्तेमाल के लिए ठीक थी, लेकिन पता नहीं क्यों अब इसकी क्वालिटी में गिरावट आई है। विराट ने टेस्ट में ड्यूक बॉल के इस्तेमाल की वकालत की थी। 2021: चेन्नई टेस्ट के बाद एक बार फिर कोहली ने कहा कि 60 ओवर के बाद बॉल की सीम पूरी तरह खराब हो गई। इस तरह की चीजों की उम्मीद आप टेस्ट क्रिकेट में नहीं कर सकते हैं।
  • 2018: अश्विन ने कहा था कि जब मैंने टेस्ट क्रिकेट खेलना शुरू किया था, तब SG बॉल से 70 यहां तक कि 80 ओवर के बाद भी बॉलिंग कर सकते थे। अब बॉल बहुत जल्दी घिस जाती है। यहां तक कि उसकी हार्डनेस 10 ओवर के अंदर ही खत्म हो जाती है। 2021: अश्विन ने कहा कि इस मैच में जो बॉल इस्तेमाल हुई, वो बहुत विचित्र थी। इसके पहले हमने कभी भी SG बॉल की सीम इस तरह से खराब होते नहीं देखी।

आइये जानते हैं आखिर SG ने क्या बदलाव किए और इससे गेंद और खेल पर किस तरह का असर होने के दावे किए गए…

पहला बदलाव: गेंद में होने वाले वैरिएशन को कम किया

बॉल की सीम (यानी सिलाई) पर काम किया गया है। उसकी कंसिस्टेंसी को और बेहतर किया गया है, जिससे वो पूरे 80 ओवर तक ग्रिपिंग के लिए बेहतर रहे। आसान भाषा में कहें तो अब बॉल का साइज ज्यादा चेंज नहीं होगा। पहले खेलते-खेलते सिलाई ढीली पड़ जाती थी, जिससे बॉल का डायमीटर 1 mm तक कम हो जाता था, लेकिन अब 0.25 mm तक ही कम होगा, यानी अगर बॉल 72 mm डायमीटर की होती थी, तो वो 71 mm तक हो जाती थी, लेकिन अब पुरानी होने पर भी सिर्फ 71.75 mm तक होगी।

बदलाव का असर: गेंदबाजों की गेंद पर ग्रिप बेहतर होगी। खासतौर पर स्पिनर्स को इससे फायदा होगा। बेहतर ग्रिप के कारण वो बॉल को ज्यादा घुमा सकेंगे। वहीं, फास्ट बॉलर्स को भी बेहतर ग्रिप से सीम पर लैंड कराने में आसानी होगी। इससे बॉलर ज्यादा कंट्रोल के साथ बॉलिंग कर सकेगा।

दूसरा बदलाव: बॉल के अंदर के कॉर्क की हार्डनेस को बेहतर किया गया

बॉल के अंदर जो कॉर्क वुड डलता है, उसकी डेंसिटी को एक मिनिमम लेवल पर फिक्स किया गया है। अगर कॉर्क की डेंसिटी उस मिनिमम लेवल से कम होती है, तो उसे इस्तेमाल नहीं करते। इससे हर बॉल की हार्डनेस कंसिस्टेंट रहती है। हालांकि, कंपनी ने ये नहीं बताया है कि डेंसिटी लेवल कितना होगा। कॉर्क का साइज बढ़ाए जाने की खबरें मीडिया में चल रही हैं। हालांकि कंपनी इससे इंकार करती है।

बदलाव का असर: इससे बॉल का बाउंस बेहतर होगा। बॉल की हार्डनेस 50 से 60 ओवर तक बनी रहेगी। इससे गेंदबाजों को मदद मिलेगी। कोहली ने 2018 में ड्यूक बॉल की हार्डनेस के कारण ही टेस्ट में इसे इस्तेमाल करने की वकालत की थी।

तीसरा बदलाव: रंग को और डार्क किया गया

बॉल के रंग में भी कुछ बदलाव किया गया है। नई बॉल पहले से ज्यादा डार्क रेड कलर में है।

बदलाव का असर: इस बदलाव को कंपनी साइकोलॉजिकल बताती है। SG के मार्केटिंग डायरेक्टर पारस आनंद कहते हैं कि मैंने टीम इंडिया के कई खिलाड़ियों से बात की, सभी ने बोला कि बॉल का डार्क शेड ज्यादा बेहतर है। खिलाड़ियों के सुझाव पर इसके शेड को थोड़ा ज्यादा डॉर्क किया गया है।

SG 1993 से भारत के फर्स्ट क्लास क्रिकेट की ऑफिशियल बॉल सप्लायर है। पिछले कई सालों से कंपनी खिलाड़ियों से मिले फीडबैक के आधार पर बॉल में बदलाव करती रही है। ये बदलाव भी उसी का हिस्सा हैं।

भारत के अलावा बाकी देश टेस्ट में ड्यूक या कूकाबुरा बॉल इस्तेमाल करते हैं

1. कूकाबुरा: ये बॉल ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, साउथ अफ्रीका, न्यूजीलैंड, श्रीलंका, बांग्लादेश, जिम्बाब्वे और अफगानिस्तान टेस्ट मैच के लिए इस्तेमाल करते हैं। ये ऑस्ट्रेलिया में बनाई जाती है। इसकी सिलाई मशीन से होती है। इसकी सीम दबी हुई होती है। शुरुआती 20 से 30 ओवर ये गेंद तेज गेंदबाजी के लिए बेहतर होती है। इसके बाद ये बल्लेबाजी के लिए बेहतर होती है। सीम दबी होने के कारण ये गेंद स्पिनरों के लिए अन्य बॉल की तुलना में कम मददगार होती है।

कुकाबूरा की कहानी: इस कंपनी की शुरुआत 1890 में A.G. थॉमसन ने की थी। उस वक्त ये कंपनी घोड़े की हार्नेस और काठी बनाने का काम करती थी। बाजार में कारों के आने के बाद कंपनी संकट के दौर से गुजरने लगी तो उसने क्रिकेट बॉल बनाना शुरू किया। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में शुरू हुई कंपनी आज क्रिकेट और हॉकी बॉल और इन खेलों से जुड़े सामानों को बनाने के लिए ही जानी जाती है। वनडे और टी-20 में इस्तेमाल होने वाली सफेद बॉल सबसे पहले 1978 में बनी। इसे कुकाबूरा ने ही बनाया था।

2. ड्यूक: इंग्लैंड, आयरलैंड और वेस्टइंडीज इसका इस्तेमाल करते हैं। ये बॉल इंग्लैंड में बनती है। इसकी सीम उभरी हुई होती है। इसकी सिलाई हाथ से होती है। इसकी हार्डनेस 60 ओवर तक बनी रहती है। इस गेंद को तेज गेंदबाजों के लिए मददगार माना जाता है। इससे 20 से 30 ओवर बाद ही रिवर्स स्विंग मिलने लगती है। जबकि कूकाबुरा और SG बॉल 50 ओवर के आसपास रिवर्स स्विंग होनी शुरू होती हैं।

ड्यूक की कहानी: इंटरनेशनल क्रिकेट शुरू होने से 117 साल पहले यानी 1760 से ड्यूक गेंद बना रही है। कंपनी कहती है कि ड्यूक स्पोर्ट्स इक्विपमेंट्स बनाने वाली शायद सबसे पुरानी कंपनी है। ब्रिटेन के केंट से शुरू हुई इस कंपनी के मौजूदा मालिक भारतीय मूल के दिलीप जजोदिया हैं। ड्यूक ने 1780 में पहली बार सिक्स-सीम क्रिकेट बॉल बनाई थी। इसे उस वक्त के प्रिंस ऑफ वेल्स को दिया गया था। 1780 के इंग्लिश क्रिकेट सीजन में ये बॉल इस्तेमाल हुई थी।

3. SG: भारत अकेला देश है जो SG बॉल का इस्तेमाल करता है। ये बॉल भारत में ही बनती है। इस बॉल की सीम उभरी हुई होती है। इसकी सिलाई भी ड्यूक की तरह हाथ से की जाती है। इस गेंद को स्पिनर्स के लिए मददगार माना जाता है। नए बदलावों के बाद इससे स्पिनर्स के साथ ही तेज गेंदबाजों को भी मदद मिलने की उम्मीद है।

SG की कहानी: 1931 में केदारनाथ और द्वारकानाथ आनंद नाम के दो भाइयों ने सियालकोट में इस कंपनी की शुरुआत की। बंटवारे के बाद परिवार आगरा आ गया। 1950 में मेरठ से कंपनी की फिर शुरुआत हुई। 1994 से देश में हुए सभी टेस्ट में SG बॉल का ही इस्तेमाल हुआ है।

बॉल के इस्तेमाल को लेकर ICC का कोई नियम नहीं
बॉल के इस्तेमाल को लेकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) के कोई खास दिशा-निर्देश नहीं हैं। सभी देश अपनी कंडीशन के लिहाज से बॉल का इस्तेमाल करते हैं। जिस देश में सीरीज हो रही होती है, वो देश अपनी पसंद के हिसाब से बॉल का इस्तेमाल करता है। कोई देश चाहे तो एक सीरीज अलग बॉल से खेले, दूसरी सीरीज देश में ही अलग बॉल से खेलना चाहे तो वो ऐसा भी कर सकता है।



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